
- प्रति स्कूल दो शिक्षकों का भी औसत नहीं, प्रत्येक कक्षा के लिए एक-एक शिक्षक जरूरी, 103 स्कूलों में एक ही शिक्षक
रायगढ़। प्राइवेट स्कूलों से प्रतिस्पर्धा कर रही हमारी सरकारी शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह फेल हो चुकी है। पांचवीं तक की मिली शिक्षा प्रत्येक छात्र का आधार होती है, जिसके बलबूते वह आगे की कक्षाओं में बेहतर प्रदर्शन करता है। प्राइवेट स्कूलों में प्रत्येक कक्षा, प्रत्येेक विषय के लिए एक अलग शिक्षक होता है। यही एकमात्र कारण है जिसकी वजह से बच्चे ज्ञानवान होते हैं। वहीं सरकारी प्रायमरी स्कूलों की हालत मरणासन्न हो गई है। शिक्षा का बाजारीकरण तकरीब पूरा हो चुका है। अब कोई गुंजाइश नहीं कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था सुधर जाए।
स्कूली शिक्षा को जनकल्याण योजनाओं की तरह माना जाने लगा है। मध्याह्न भोजन और मुफ्त किताबों व गणवेश से आगे कोई बात ही नहीं हो रही है। प्राइवेट संस्थानों में जितना महत्व उच्च कक्षाओं का है, उतना ही महत्व प्रायमरी स्कूलों का है। सरकारी स्कूलों में इसका उल्टा है। सबसे कमजोर शिक्षक प्रायमरी स्कूलों में हैं। इसका असर शिक्षा के स्तर पर पड़ रहा है। प्राथमिक शालाओं में प्रत्येक कक्षा के लिए एक अलग शिक्षक भी नहीं है। दो-तीन शिक्षक ही पांच कक्षाओं का भार उठा रहे हैं। एक ही कमरे में एक से अधिक कक्षाएं लग रही हैं। जिले में कुल 1423 प्रायमरी स्कूल हैं। जिनमें 51707 बच्चे हैं। इतने स्कूलों के लिए 3525 शिक्षकों के पद स्वीकृत हैं।
मतलब प्रति स्कूल 2.4 शिक्षक पद हैं। उसमें भी केवल 2055 पद भरे हैं, मतलब एक स्कूल में औसतन 1.44 शिक्षक है। पांच कक्षाओं के लिए दो शिक्षक भी औसतन नहीं हैं। 1470 पद रिक्त पड़े हैं। वर्तमान में समीक्षा 3055 स्वीकृत पदों की तुलना में भरे पदों की हो रही है जबकि इससे दोगुने शिक्षक चाहिए। उसमें भी 103 प्राथमिक शालाएं ऐसी हैं जहां एकल शिक्षक है। एक ही शिक्षक पहली से लेकर पांचवीं तक की कक्षाओं को पढ़ा रहा है। अब इन स्कूलों में शिक्षा गुणवत्ता की बात करना बेमानी है। 23 माध्यमिक स्कूल भी ऐसे हैं जहां एक ही टीचर है।
प्रति स्कूल दो शिक्षक का भी औसत नहीं
प्राइवेट स्कूलों में मिल रही शिक्षा से तुलना करना आसान है लेकिन वहां के बराबर संसाधन जुटाने पर ध्यान नहीं है। प्रायमरी स्कूलों की पांच कक्षाओं में ही आगे की शिक्षा का बेस बनता है। बच्चों में ज्ञान का पहला बीजोरोपण प्राथमिक स्तर पर ही होता है। रायगढ़ जिले में प्रायमरी स्कूलों और शिक्षकों का अनुपात बेहद खराब है। प्रति स्कूल दो शिक्षकों का भी औसत नहीं है। प्रति कक्षा एक शिक्षक होने पर ही स्थिति कुछ बेहतर हो पाएगी।
युक्तियुक्तकरण से क्या मिला?
सरकार ने युक्तियुक्तकरण को शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए किया जा रहा प्रयास सिद्ध कर दिया। हकीकत यह है कि इससे कुछ नहीं बदला। केवल स्कूलों की संख्या कम हुई। सरकार ने सोचा था कि स्कूलों की संख्या कम करने से उपलब्ध शिक्षकों का प्रति स्कूल औसत बढ़ जाएगा। ऐसा करने के बावजूद शिक्षकों की औसत संख्या दो भी नहीं हो सकी है।

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